छठ पूजा की शुरुआत की कहानी
बहुत समय पहले की बात है। भारत में सूर्य देव की पूजा प्राचीन काल से होती आ रही है। कहा जाता है कि छठ पूजा की परंपरा की शुरुआत Ramayana काल से मानी जाती है।
जब Lord Rama ने 14 वर्षों का वनवास पूरा किया और Sita के साथ Ayodhya लौटे, तब पूरे राज्य में खुशी का माहौल था। राज्य के सुख, शांति और समृद्धि के लिए माता सीता ने सूर्य देव की उपासना करने का निर्णय लिया। उन्होंने कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन नदी के किनारे खड़े होकर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया और अगले दिन उगते सूर्य को भी अर्घ्य देकर पूजा पूरी की। तभी से यह परंपरा छठ पूजा के रूप में प्रसिद्ध हो गई।
एक दूसरी कथा Mahabharata से भी जुड़ी है। कहा जाता है कि जब Pandavas अपना राज्य हार गए और बहुत कठिन समय से गुजर रहे थे, तब Draupadi ने सूर्य देव की आराधना की। उन्होंने छठ का व्रत रखा और पूरी श्रद्धा से पूजा की। इससे पांडवों को शक्ति और आशीर्वाद मिला और बाद में उन्हें अपना खोया हुआ राज्य वापस मिल गया।
छठ पूजा में लोग पूरे चार दिन तक बहुत कठोर व्रत रखते हैं। इस दौरान व्रती साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखते हैं और शुद्ध भोजन करते हैं। पूजा के दिन महिलाएं और पुरुष नदी, तालाब या घाट पर जाकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद अगले दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत पूरा किया जाता है।
यह पर्व खासकर Bihar, Uttar Pradesh, Jharkhand और Nepal में बहुत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग ठेकुआ, फल, गन्ना और कई प्रकार के प्रसाद चढ़ाते हैं और सूर्य देव से परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना करते हैं।
छठ पूजा केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, सूर्य और जल के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व है। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति का सम्मान करना और ईश्वर के प्रति आस्था रखना हमारे जीवन को सुख और शांति से भर देता है।





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